Sunday, May 11, 2025

आपके बच्चों की परवरिश कौन कर रहा है?

जब मां-बाप व्यस्त होते हैं, तब मोबाइल गुरु बनता है
एक चेतावनी, एक समाधान — सनातन के स्वर में
शिष्य (प्रश्न करते हुए): गुरुदेव, आज के युग में हम सब पढ़-लिख रहे हैं, तकनीक में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन भीतर से खाली-खाली महसूस करते हैं। मेरे मन में एक सवाल बहुत दिनों से है—“आपके बच्चों की परवरिश कौन कर रहा है?” क्या माता-पिता? स्कूल? मोबाइल? या सोशल मीडिया?
श्री शिवानंद महाराज (मुस्कुराते हुए): प्रिय वत्स, यह प्रश्न जितना सरल लगता है, उसका उत्तर उतना ही गहन है। परवरिश केवल भोजन, वस्त्र और शिक्षा तक सीमित नहीं होती। परवरिश वह प्रक्रिया है जिसमें बालक का चरित्र, संस्कार, विचार, और दृष्टिकोण गढ़े जाते हैं। यह निर्माण यदि सत्संग, शास्त्रों, और संस्कृति के आलोक में न हो, तो केवल शरीर बड़ा होता है, आत्मा नहीं।
शिष्य: लेकिन गुरुदेव, आजकल तो माता-पिता खुद व्यस्त हैं। बच्चे स्कूल, कोचिंग और इंटरनेट के हवाले हैं। क्या यही परवरिश है?
श्री शिवानंद महाराज: वत्स, गृहस्थ धर्म में सबसे पहली जिम्मेदारी होती है — संतान के भीतर धर्मबोध और विवेक जागृत करना। यदि माता-पिता इस दायित्व से विमुख हो जाएं और यह कार्य मोबाइल, टीवी या सोशल मीडिया को सौंप दें, तो एक मशीनी पीढ़ी तैयार होगी — संवेदनहीन, दिशाहीन, और जड़मूल से कटे हुए।
वेदों में कहा गया है— वह ज्ञान जो तुम्हें भीतर से मुक्त करे। पर आज का ज्ञान तो उलझा रहा है, भ्रमित कर रहा है, क्योंकि वह केवल सूचना है, बोध नहीं।
शिष्य: गुरुदेव, क्या शिक्षा प्रणाली भी इसकी जिम्मेदार है?
श्री शिवानंद महाराज: निःसंदेह वत्स। स्वतंत्रता के बाद की शिक्षा प्रणाली ने मूल्यनिष्ठा को त्याग दिया। गुरुकुलों में शिक्षा आत्मा को जागृत करती थी, आज की शिक्षा सिर्फ डिग्री देती है। एक काल था जब शिष्य गुरु से केवल श्लोक नहीं, जीवन जीने की कला सीखता था। आज का विद्यार्थी उत्तर रटता है, प्रश्न नहीं करता।
शिष्य: पर हम आधुनिक युग में हैं। क्या ऐसे में वेद-पुराण की बातें प्रासंगिक हैं?
श्री शिवानंद महाराज (गंभीर स्वर में): यही सबसे बड़ा भ्रम है, पुत्र। समय बदल सकता है, पर सत्य नहीं बदलता।
जैसे शरीर को आहार चाहिए, वैसे ही आत्मा को भी संस्कार चाहिए। वेदों की शिक्षाएं शाश्वत हैं क्योंकि वे मानव स्वभाव को समझती हैं, न कि केवल किसी युग विशेष को।
उपनिषदों में कहा गया है— आत्मा को देखो, सुनो, सोचो, और ध्यान करो। पर आज की पीढ़ी आत्मा का नाम भी नहीं सुनती, बस बाहर की चकाचौंध में खो गई है।
शिष्य: गुरुदेव, हम युवा क्या करें? हम तो उसी व्यवस्था में पले हैं।
श्री शिवानंद महाराज: वत्स, उत्तरदायित्व से भागना सनातन नहीं, संघर्ष करना सनातन है। तुम्हें इस अंधकार में दीप बनना है। पहला कदम है — जागरूकता। यह प्रश्न तुमने उठाया — यह स्वयं में एक क्रांति है।
अब अपने आसपास देखो — क्या तुम्हारे छोटे भाई-बहन की परवरिश मोबाइल कर रहा है?
क्या टीवी उन्हें सिखा रहा है कि जीवन का उद्देश्य केवल पैसा और प्रसिद्धि है? यदि हाँ, तो यही वह क्षण है जब तुम्हें कुछ बदलना होगा।
संक्षेप में: आज हमारे बच्चों की परवरिश संवेदनशील हृदयों से नहीं, मशीनों से हो रही है। माता-पिता प्रेम करते हैं, पर समय नहीं दे पाते। शिक्षक पढ़ाते हैं, पर दिशा नहीं दे पाते। और बच्चे, सीखते हैं... लेकिन क्या?, यह कोई नहीं देख रहा।
शब्द नहीं, दृष्टि बदलनी होगी।
शिष्य: गुरुदेव, आपने कहा कि परवरिश केवल शारीरिक विकास नहीं, बल्कि आत्मिक और मानसिक विकास भी है। लेकिन आज के माता-पिता कहते हैं — "हम तो बच्चों को सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ा रहे हैं, अच्छे कपड़े और मोबाइल दे रहे हैं, और उनका हर सपना पूरा कर रहे हैं। इससे ज़्यादा और क्या करें?"
श्री शिवानंद महाराज (शांत स्वर में): वत्स, सपने पूरे करना बुरा नहीं है, लेकिन यह देखना ज़रूरी है कि वो सपने किस दिशा में ले जा रहे हैं। एक राजा अपने पुत्र को राजसिंहासन देना चाहता था, लेकिन पहले उसे जंगल में ऋषियों की सेवा में भेजता है — क्यों? क्योंकि एक संवेदनशील और विवेकी हृदय के बिना अधिकार केवल अत्याचार बन जाता है।
आज माता-पिता बच्चों को सुविधाएं दे रहे हैं, पर संवेदना, विवेक और विवेकपूर्ण स्वाभिमान नहीं दे पा रहे।
शिक्षा यदि मनुष्यत्व नहीं दे रही, तो वह केवल बोझ है।
शिष्य: गुरुदेव, तो क्या इसका समाधान केवल परिवार के पास है?
श्री शिवानंद महाराज: परिवार पहली पाठशाला है। चाणक्य नीति में स्पष्ट है:— पुत्र को संयम और अनुशासन से शिक्षा दो।
इसका अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि मर्यादा और अनुशासन का स्नेहपूर्ण पालन है। यदि माता-पिता ही मोबाइल में खोए रहें, टीवी देखते रहें, और बालक को अकेला छोड़ दें, तो वह विकास नहीं, विकृति की ओर बढ़ेगा।
शिष्य: तो गुरुदेव, क्या माता-पिता को बच्चों का हर समय मार्गदर्शन करना चाहिए?
श्री शिवानंद महाराज: हर समय नहीं, सही समय पर। परवरिश कोई 24 घंटे का पहरा नहीं है। यह है —
बच्चों को जिज्ञासा से भर देना
उनके प्रश्नों को सम्मान से सुनना
उन्हें संस्कारों की कहानियों से परिचित कराना
उन्हें यह सिखाना कि जीवन केवल सफलता नहीं, सेवा भी है।
उपनिषदों में यह मूल मंत्र दिया गया है: "मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथि देवो भव।"
यदि बच्चे यह चार मंत्र आत्मसात कर लें, तो वे कहीं भी जाएं, कभी पथभ्रष्ट नहीं होंगे।
शिष्य:
लेकिन गुरुदेव, बच्चे तो अब 'रोल मॉडल' के रूप में फिल्मी सितारों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को देखते हैं, ऋषि-मुनियों को नहीं।
श्री शिवानंद महाराज: यही तो सांस्कृतिक संकट है, वत्स। असली नायकों को हमने इतिहास में बंद कर दिया, और आभासी संसार के नकली चेहरों को पूजने लगे। जब बच्चों को विवेकानंद, अरविंदो, रामकृष्ण, रामायण के लक्ष्मण, या महाभारत के अभिमन्यु की कहानियाँ नहीं सुनाई जाएंगी, तो वे किससे प्रेरणा लेंगे?
गुरुकुलों में यह शिक्षा दी जाती थी कि — "चरित्र ही असली धन है।" आज हम 'करियर' के पीछे भाग रहे हैं, पर 'चरित्र' को पीछे छोड़ रहे हैं। जब तक हम आदर्शों की पुनर्स्थापना नहीं करेंगे, तब तक परवरिश अधूरी रहेगी।
संक्षेप में: आज के माता-पिता बच्चों को सब कुछ दे रहे हैं — लेकिन खुद को नहीं दे रहे। वे मोबाइल दे रहे हैं, समय नहीं। स्कूल भेज रहे हैं, लेकिन जीवन की शिक्षा नहीं दे रहे। और इस खालीपन में प्रवेश कर चुका है — बाहरी प्रभाव, जो उन्हें खींचकर ले जा रहा है उस दिशा में, जहाँ न आत्मा की पुकार है, न संस्कृति की छाया।
शिष्य: गुरुदेव, आपने बताया कि आज की परवरिश में आत्मा, संस्कृति और संवेदना की कमी है। लेकिन हम माता-पिता इस भागदौड़ भरे जीवन में बच्चों को समय नहीं दे पा रहे। ऐसे में समाधान क्या है?
श्री शिवानंद महाराज: वत्स, समय की कमी नहीं होती — प्राथमिकता की कमी होती है। आप दिन में कितनी देर मोबाइल देखते हैं? टीवी? सोशल मीडिया? यदि हम अपने बच्चे के साथ प्रतिदिन केवल 20 मिनट भी सार्थक संवाद में बिताएं, तो उसका जीवन बदल सकता है।
एक पिता के शब्दों की शक्ति उस समय सबसे अधिक होती है, जब वह अपने बेटे या बेटी की आँखों में देख कर कहता है — "मैं तुम्हारे जीवन को अर्थ देना चाहता हूँ, केवल सुविधा नहीं।"
शिष्य: गुरुदेव, पर इतनी सारी नकारात्मकता और बाहरी प्रभावों के बीच, हम बच्चों को कैसे सही मार्ग दिखाएं?
श्री शिवानंद महाराज: उन्हें विकल्प दो, विचार दो, विवेक दो। आज का युवा प्रेरणा से अधिक तर्क चाहता है। इसलिए कहानियों के माध्यम से, दृष्टांतों के माध्यम से, अपने व्यवहार के उदाहरणों से उसे सिखाओ।
महर्षि वाल्मीकि, जो कभी डाकू थे, नारद जी के एक प्रश्न से बदल गए — "क्या तू अपने पापों का भार अपने परिवारजनों के साथ बांट पाएगा?" विचार आया, विवेक जागा, और उन्होंने संसार को रामायण दी।
हमारे घर भी 'नव-आश्रम' बन सकते हैं, यदि उनमें ये 5 बातें हो जाएं:
1. सांझ की एक साथ आरती या प्रार्थना।
2. हफ्ते में एक दिन परिवार के साथ जीवन की कहानियाँ और अनुभव साझा करना।
3. बच्चों से पूछना: आज तुमने क्या सीखा जो तुम्हारे भीतर आनंद या संतोष लाया?
4. बच्चों को एक बार ‘ना’ कहना सिखाना — उन्हें सीमाओं का सम्मान करना सिखाओ।
5. परिवार में सेवा के संस्कार — जैसे किसी गरीब को खाना खिलाना, पेड़ लगाना, या किसी बीमार की सेवा।
शिष्य: गुरुदेव, क्या यह सब करना संभव है? क्योंकि आज का समाज, शिक्षा व्यवस्था, सोशल मीडिया — सब एक अलग दिशा में ले जा रहे हैं।
श्री शिवानंद महाराज: असंभव कुछ नहीं है, वत्स। सनातन धर्म ने हजारों वर्ष के कालखंड में हजारों बार ऐसे संकट देखे हैं। लेकिन हर बार परिवार, संस्कार, और सत्संग ने इसे पुनर्जीवित किया। जैसे आग को बुझने से बचाने के लिए चिंगारी को बचाना होता है, वैसे ही बच्चों के भीतर संस्कार की चिंगारी को जीवित रखना होगा।
यह चिंगारी कहानी से जल सकती है, आपकी दृष्टि से, आपके उदाहरण से, आपके स्पर्श से।
स्वामी रामसुखदास जी के शब्दों में कहें तो: "जब तक तुम बच्चे के अंतरात्मा से नहीं जुड़ते, तब तक तुम केवल पालक हो — परवरिशकर्ता नहीं।"
शिष्य: तो क्या गुरुदेव, सही परवरिश का अर्थ है — बच्चा हमारे जैसा बने?
श्री शिवानंद महाराज: नहीं वत्स। सही परवरिश का अर्थ है — "बच्चा खुद को पहचाने, और उस श्रेष्ठ स्वरूप को प्राप्त करे जिसके लिए वह जन्मा है।"
बच्चा यदि धर्म, सेवा, संयम और स्वाभिमान के साथ जीवन जीना सीख गया, तो वह चाहे डॉक्टर बने या किसान, नेता बने या कलाकार — वह मानवता का दीपक बनकर जलेगा।
संक्षेप में: आज हमें यह प्रश्न फिर से पूछने की आवश्यकता है —
"क्या मेरा बच्चा केवल सफल बन रहा है, या संवेदनशील भी बन रहा है?"
"क्या वह आगे बढ़ रहा है, या भटक रहा है?"
"क्या उसकी परवरिश केवल स्कूल और स्क्रीन कर रहे हैं, या मैं भी उसका सहयात्री हूँ?"
स्थान: मुंबई का एक आधुनिक अपार्टमेंट
पात्र:
– अर्जुन (13 वर्षीय छात्र)
– प्रिया (उसकी माँ)
– आदित्य (पिता, कॉर्पोरेट नौकरी में व्यस्त)
– श्रीमान शर्मा (अर्जुन के स्कूल के सामाजिक विज्ञान शिक्षक)
कहानी का आरंभ
अर्जुन, एक तेज दिमाग़ और चुपचाप रहने वाला बच्चा, दिन भर मोबाइल में खोया रहता था। सोशल मीडिया, गेम्स और यूट्यूब उसकी दुनिया बन चुके थे। माँ-बाप दोनों कामकाजी थे और उसे अच्छी शिक्षा, मोबाइल, कपड़े और जेब खर्च सब दे देते थे — पर समय नहीं।
एक दिन स्कूल से फोन आया — “अर्जुन की पढ़ाई में गिरावट आ रही है और उसका व्यवहार भी चिड़चिड़ा हो गया है।”
माँ ने चिंतित होकर अर्जुन से पूछा,
“बेटा, सब कुछ तो है तुम्हारे पास, फिर उदास क्यों हो?”
अर्जुन का जवाब सीधा और सच्चा था —
“माँ, सब कुछ है… सिवाय एक बात के — मेरी बात सुनने वाला कोई नहीं है।”
माँ स्तब्ध रह गई।
अगला दिन — स्कूल में विशेष सत्र
श्रीमान शर्मा ने एक कहानी सुनाई —
“प्राचीन काल में एक ऋषि थे, जिनका पुत्र बहुत उद्दंड हो गया था। उन्होंने उसे गुरु के पास भेजा। गुरु ने कुछ नहीं सिखाया, केवल हर दिन एक बात पूछी —
‘आज तुमने अपने आप से क्या सीखा?’
धीरे-धीरे वह बालक आत्म-चिंतन करने लगा। उसे अपने क्रोध, इच्छाओं और गलतियों का बोध हुआ।
वह फिर से विनम्र, ज्ञानवान और जिम्मेदार बन गया।"
श्री शर्मा बोले,
“बच्चों को आदेश नहीं, दिशा चाहिए।
तालीम नहीं, तालमेल चाहिए।
मोबाइल नहीं, ममत्व चाहिए।”
घर लौटकर परिवर्तन की शुरुआत
उस रात अर्जुन की माँ ने पहली बार मोबाइल दूर रखकर उसे गले लगाया।
पिता ने अपने लैपटॉप बंद कर कहा —
“बेटा, चलो आज तुम्हारे साथ बैठकर तुम्हारे सवालों का जवाब देते हैं।”
अर्जुन ने कहा,
“पापा, आप भी गुरु बन सकते हैं क्या?”
पिता मुस्कराए — “अगर तू अर्जुन बन जाए, तो मैं आज से तेरा कृष्ण बन जाऊँगा।”
उस दिन से अर्जुन के जीवन में बदलाव आने लगा।
कथा का सार:
आज हर घर में अर्जुन है — उत्सुक, बुद्धिमान, लेकिन दिशाहीन।
हर अर्जुन को एक कृष्ण चाहिए — जो उसका रथ थामे, युद्ध न लड़े, केवल मार्ग दिखाए।
यह ‘रथ’ है उसका मन, उसके विचार।
और कृष्ण वही बन सकता है जो सुनता है, समझता है, और सही समय पर सही प्रश्न पूछता है।
उपनिषदों का संदेश:
जैसे एक बालक को केवल शरीर नहीं, संस्कार भी चाहिए — वैसे ही आत्मा को केवल शिक्षा नहीं, विवेक की परवरिश चाहिए।
आपका स्वागत है सनातन वाणी मेंशाश्वत ज्ञान की स्वरधारा।

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