“प्रभाव नहीं, आत्मा से अभिव्यक्ति — यही है सनातन का पथ”
स्थान: काशी के एक शांत आश्रम में, जहां श्री शिवानंद महाराज युवाओं के साथ संवाद कर रहे हैं।
शिष्य (राहुल): गुरुदेव, आज के युग में हर कोई किसी को प्रभावित करना चाहता है — सोशल मीडिया पर, ऑफिस में, दोस्तों के बीच। पर अक्सर ये प्रयास कृत्रिम लगते हैं। क्या ऐसा प्रयास करना सही है?
श्री शिवानंद महाराज (मुस्कुराते हुए): वत्स, तुमने सही प्रश्न किया। दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश और आत्म-अभिव्यक्ति — दोनों का संबंध मन के प्रभावों (impressions) से है। जब तुम स्वाभाविक होते हो, तब तुम न केवल खुद को व्यक्त करते हो, बल्कि आत्मा से जुड़कर बोलते हो — और वही अभिव्यक्ति युगों तक जीवित रहती है।
शिष्य (मेघा): पर गुरुदेव, हम सब को कई बार यह समझ ही नहीं आता कि हमारी अभिव्यक्ति स्वाभाविक है या किसी प्रभाव के कारण?
गुरुजी: यही तो जागरूकता का प्रारंभ है। वेदों में कहा गया है — “सत्यम् वद, धर्मं चर।” अर्थात सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। लेकिन जब तुम 'सत्य' को व्यक्त करना चाहते हो, तो पहले देखो कि वह सत्य कहां से आ रहा है — आत्मा से या अहंकार से?
शिष्य (आरव): और गुरुदेव, ये “प्रभाव (impressions)” क्या होते हैं जो मन को विचलित कर देते हैं?
गुरुजी: वत्स, प्रत्येक अनुभव, घटना, वार्ता — यहां तक कि तुम्हारे मोबाइल पर स्क्रॉल की गई एक तस्वीर — सब तुम्हारे चित्त पर एक छाप छोड़ते हैं। इन छापों को ही संस्कार कहा जाता है। जब ये प्रभाव बहुत अधिक हो जाते हैं, तो तुम्हारा मन भ्रमित, विचलित और अस्थिर हो जाता है।
शिष्य (संध्या): क्या यही कारण है कि हम कभी-कभी असमंजस, फोकस की कमी, और भीतर की शांति खो बैठते हैं?
गुरुजी: बिल्कुल। यही कारण है। जो शिष्य इन प्रभावों से ऊपर उठना सीख जाता है, वही स्थितप्रज्ञ बनता है — जैसा श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन से श्रीकृष्ण ने कहा। जब मन स्थिर होता है, तभी आत्मा की आवाज सुनाई देती है।
शिष्य (राहुल): लेकिन हम अपने प्रभावों को कैसे नियंत्रित करें?
गुरुजी: यह नियंत्रण नहीं, चयन है। बुद्धिमत्ता है — प्रभावों का चयन और अभिव्यक्तियों का संतुलन। जैसे एक कुशल चित्रकार अपने रंगों का चुनाव करता है, वैसे ही एक साधक को चाहिए कि वह अपने मन को कौन से विचार, कौन से अनुभव, और कैसी संगति दे — यह तय करे।
शिष्य (मेघा): गुरुदेव, क्या ध्यान से इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है?
गुरुजी: ध्यान ही एकमात्र उपाय है। ध्यान वह साधना है जो मन के विक्षेपों को मिटाती है, प्रभावों को धोती है, और आत्मा की ज्योति को प्रज्वलित करती है। “ध्यान से स्वप्न मिटते हैं, स्वप्न से प्रभाव घटते हैं, और प्रभाव मिटते हैं तो अभिव्यक्ति दिव्य होती है।”
शिष्य (आरव): पर गुरुदेव, इस दुनिया में बिना अभिव्यक्ति के कैसे जिया जा सकता है?
गुरुजी: अभिव्यक्ति अवश्य हो — पर वह आत्मा से हो, न कि दिखावे से। अत्यधिक अभिव्यक्ति, आत्मा की शांति को भंग करती है। जैसे बहुत ज़ोर से बजने वाला वाद्ययंत्र भी अंततः टूट जाता है, वैसे ही अत्यधिक बोलना, प्रदर्शन करना तुम्हारे भीतर की गहराई को क्षीण कर देता है।
शिष्य (संध्या): तो गुरुदेव, हमें क्या करना चाहिए?
गुरुजी: बस शांत हो जाओ। अपने भीतर की गहराई से जुड़ो। पढ़ो, मनन करो, ध्यान करो। महापुरुषों ने यही किया है — अभिव्यक्ति से पहले आत्म-निरीक्षण। तब जाकर उनका एक-एक शब्द ग्रंथ बन गया, युगों तक जीवित रहा। जैसे संत कबीर ने कहा था — “बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि। हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।”
“जब आत्मा बोले, तब शब्द नहीं शब्दों से परे प्रभाव होता है”
शिष्य (राहुल): गुरुदेव, आपने कहा कि जब हम आत्मा से जुड़े होते हैं, तो हमारी अभिव्यक्ति दिव्य होती है। लेकिन क्या यह हर किसी के लिए संभव है? क्या साधारण लोग भी इस स्थिति तक पहुंच सकते हैं?
श्री शिवानंद महाराज (सहज भाव से): क्यों नहीं वत्स? यह कोई असाधारण उपलब्धि नहीं, बल्कि हर जीवात्मा की जन्मजात क्षमता है। “तपो हि परमं शक्तिः,” — आत्मा की शक्ति तप से प्रकट होती है। और तप का अर्थ केवल व्रत-उपवास नहीं, बल्कि ध्यान, संयम, और आत्म-निरीक्षण भी है।
शिष्य (मेघा): गुरुदेव, कभी-कभी मन की इतनी चंचलता होती है कि हम स्वयं को ही नहीं समझ पाते — तब अभिव्यक्ति कैसी होगी?
गुरुजी: जब चित्त चंचल होता है, तब अभिव्यक्ति केवल शोर होती है — संवाद नहीं। ध्यान और सत्संग, मन को स्पष्ट करते हैं। जैसे गंदे जल में कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखता, वैसे ही अशांत मन में आत्मा की झलक भी धुंधली हो जाती है। “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” — यही पतंजलि योगसूत्र का पहला सूत्र है। मन की वृत्तियों का निरोध ही योग है, और योग ही सच्ची अभिव्यक्ति का आधार है।
शिष्य (आरव): गुरुदेव, क्या संतों और महापुरुषों की वाणी इतनी प्रभावशाली इसलिए थी क्योंकि वे आत्मा से बोलते थे?
गुरुजी: बिल्कुल! तुलसीदास जी जब रामचरितमानस लिख रहे थे, तब उन्होंने कहा — “बिनु हरिकृपा मिलहिं न संतोसा।” उन्होंने श्रीराम को माध्यम बनाया, अहंकार को त्यागा, और आत्मा से काव्य की धारा बहाई। कबीर, सूरदास, चैतन्य महाप्रभु — इन सबकी वाणी में आत्मा की अग्नि थी, अहंकार की राख नहीं।
शिष्य (संध्या): गुरुदेव, आधुनिक जीवन में जहाँ निरंतर भागदौड़ है, वहाँ अभिव्यक्ति और आत्मा को जोड़ना कैसे संभव है?
गुरुजी: यहीं तो सनातन संस्कृति की सुंदरता है। हमारे ऋषियों ने जो मार्गदर्शन दिया है, वह केवल वनवासियों के लिए नहीं, बल्कि गृहस्थों, व्यापारियों, और कर्मयोगियों के लिए भी है। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” — जब तुम फल की चिंता किए बिना अपने कर्म में स्थित होते हो, तो वह भी एक ध्यान बन जाता है।
शिष्य (राहुल): तो गुरुदेव, क्या हम अपने दैनिक जीवन में ध्यान को उतार सकते हैं?
गुरुजी: क्यों नहीं! जब तुम भोजन ध्यानपूर्वक करते हो, किसी से प्रेमपूर्वक बात करते हो, ईमानदारी से काम करते हो — वह सब ध्यान है। ध्यान कोई विशेष मुद्रा नहीं, एक विशेष दृष्टि है। “साक्षी भाव” — सब कुछ देखना, अनुभव करना, पर बिना चिपके हुए।
शिष्य (मेघा): गुरुदेव, अगर हम ध्यान और साधना से अपने प्रभावों को मिटा दें, तो क्या अभिव्यक्ति स्वतः निर्मल हो जाएगी?
गुरुजी: हां, जब मन खाली होता है, तब उसमें ब्रह्म की वाणी उतरती है। जैसे बाँस की बंसी जब अंदर से खोखली होती है, तभी श्रीकृष्ण उसमें बंसी बजा पाते हैं। वही बंसी — बिना शब्दों के — सम्पूर्ण सृष्टि को मोहित कर देती है। इसी प्रकार जब तुम स्वयं से खाली होते हो, तभी ब्रह्म तुम्हारे माध्यम से बोलता है।
शिष्य (संध्या): गुरुदेव, क्या इस प्रकार की अभिव्यक्ति ही सच्चे प्रभाव की जननी है?
गुरुजी: हाँ। यह अभिव्यक्ति न दिखावे पर आधारित है, न तर्क पर — यह अनुभूति की गहराई से आती है। जैसे चाणक्य का एक वाक्य इतिहास की दिशा बदल देता है, जैसे विवेकानंद की एक पुकार ने हजारों युवाओं को जगा दिया — यह सब आत्मा से निकली अभिव्यक्ति थी।
गुरुजी (आखिर में): वत्सों, दूसरों को प्रभावित करने की चाह छोड़ दो, स्वयं से जुड़ने का प्रयास करो। जब तुम आत्मा से जुड़ जाओगे, तो तुम्हारा मौन भी वाणी से अधिक प्रभावशाली हो जाएगा।
इस प्रकार गुरु-शिष्य संवाद में स्पष्ट होता है कि — “अभिव्यक्ति तब दिव्य होती है जब वह आत्मा से निकलती है, न कि अहंकार से।”
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